Superboys Of Malegaon Review:गली बॉयज से हीरो बनने तक का “फिल्मी” सफर

Written by: Arshi
Publish On: September 27, 2025 11:30 PM (IST)
Superboys of Malegaon Review in hindi

फिल्म इंडस्ट्री की वास्तविकता को दिखाती हुई मूवी “सुपर बॉयज ऑफ मालेगांव”। जो फ़िल्में पसंद करने वाले हर एक दर्शक की पहली पसंद बन जाएगी, स्पेशली उन दर्शकों की जो सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं, बल्कि उससे भी ऊपर कुछ एक्सपीरियंस करने के लिए फ़िल्में देखना चाहते है।

ये उन लोगों के लिए बनी है, जिन्हें सपने देखना पसंद है। क्यूंकि इसमें एक बड़ा मैसेज अपने दर्शकों के लिए रखा गया है, कि “सपने सिर्फ देखने के लिए नहीं बल्कि पूरे करने के लिए देखे जाते हैं”।

2 घंटे 7 मिनट के रनिंग टाइम वाली ये फिल्म आपके लिए कॉमेडी के साथ एक मोटिवेशनल स्टोरी रिप्रेजेंट करती है। जिसकी कहानी एक फिल्ममेकर के कुछ दोस्तों के साथ आगे बढ़ती है जो अपने ही गाँव से एक नई शुरुआत करना चाहता है।

सुपरबॉयज ऑफ मालेगाँव की कहानी 2008 में आयी फिल्म ‘सुपर मैन ऑफ मेलगांव’ से ली गई है, जिसे फैज़ा अहमद खान के द्वारा बनाया गया था। अब 2025 में थिएटर पर रिलीज़ हुई इस फिल्म को पिछले ही साल 13 सितंबर 2024 को TIFF (टोरंटो इंटरनेशनल फिल्मफेस्टिवल) में प्रीमियर किया गया था।

इस बार फिल्म में “रीमा कागती” का भी प्रदर्शन देखने को मिलेगा। वरुण ग्रोवर द्वारा लिखित सुपर बॉयज ऑफ मालेगांव की कहानी दर्शकों के सामने क्या कुछ नया पेश करना चाहती है,आइये जानते है आज के इस आर्टिकल में और करते हैं इसकी समीक्षा ।

स्टोरी:सपनों को सच करने की उड़ान

28 फरवरी 2025 को सिनेमा घरों में रिलीज़ हो चुकी इस फिल्म की कहानी आपको मेलगांव के फिल्म निर्माता नासिर शेख से मिलाती है जो अपने ही गाँव के कुछ दोस्तों के साथ मिलकर फिल्म बनाने का सपना देखता है।

जिसे न सिर्फ देखा जाता है बल्कि पूरा भी किया जाता है और इस सपने को पूरा करने के लिए नासिर शेख के आगे क्या क्या चुनौतियां आती है और ये पूरा दोस्तों का ग्रुप इस सिचुएशन को कैसे हैंडल करता है बहुत ही बखूबी से दिखाया गया है।

“मैं अदीब हूं,नहीं तुम अदीब नहीं अजीब हो” जैसे डायलॉग आपके चेहरे पर हल्की से मुस्कान छोड़ जाते है। हालाकि इन सभी दोस्तों के इस फिल्म बनाने वाले सपने के बीच बहुत सारे लड़ाई झगड़े और बाद विवाद भी शामिल हैं, जो सुपरबॉयस ऑफ मालेगांव को और भी ज्यादा रोमांचक बनाते हैं।जिन्हे जानने के लिए आपको देखनी होगी यह फिल्म।

टेक्निकल एस्पेक्ट:

फिल्म में भले ही बड़े-बड़े शूटिंग सेट्स को नहीं दिखाया गया हो, पर जिस तरह से एक नॉर्मल सी कहानी को इतना ज्यादा सच्चाई से पेश किया गया वह देखने में बढ़िया है। बात करें सिनेमेटोग्राफी कि तो उसका कोई जोड़ नहीं,क्योंकि इतने कम रिसोर्सेस के साथ ऐसा माहौल बनाना तारीफ के काबिल है।

निगेटिव पहलू:

एक फिल्म के अंदर दूसरी फिल्म को बनते हुए दिखाना एक काफी बड़ी और टाइम कंज्यूमिंग चीज है। जिसे दिखाने में सुपरबॉय ऑफ मालेगांव के मेकर्स सफल रहे पर कुछ ऐसी डिटेलिंग भी बाकी रह गई जिसमें “अकरम और नादिर के बीच वह झगड़ा जो अचानक १ मिनट में सिमट जाता है” जिसे अगर और भी ज्यादा अच्छे से प्रेजेंट की जाती तो शायद इस फिल्म को देखने का एक्सपीरियंस ज्यादा बेहतर बनाया जा सकता था।

पॉजिटिव पहलू:

कम बजट में बेहतरीन एक्सपीरियंस:

फिल्म की पहली बड़ी खूबी इसका बजट है, जिसे काफी कम लागत के साथ बनाया गया,जितने में बड़े स्टार्स की तीन से चार फिल्में बनती,उतने में इस एक मूवी को बनाकर कंप्लीट किया गया है।

एक्सेल इंटरनमेंट का हाथ:

साल 1999 के समय बना प्रोडक्शन हाउस एक्सेल इंटरटेनमेंट जिसे “फरहान अख्तर” और जोया अख्तर संभालते हैं। अब तक इस बैनर के तले बनी बहुत सारी फिल्में सुपरहिट साबित रही हैं। जिसके चलते इस बार भी डायरेक्टर “जोया अख्तर” ने रीमा कागती के साथ मिलकर अपने डायरेक्शन का जादू “सुपर बॉयज का मालेगांव” पर चला दिया है।

ज़ीरो से हीरो बनने तक का सफर:

फिल्म की कहानी मुख्य रूप से ऐसे लोगों पर फोकस करती है ,जिनके एक वक्त के खाने का इंतेज़ाम भी काफी मुश्किल से होता है। ऐसे में इस माहौल मसे पनपे युवाओं के हीरो बनने तक सफर देखना काफी इंटरेस्टिंग और भावात्मक है।

निष्कर्ष: मालेगांव के सुपरबॉयस का जलवा

अगर आप कॉमेडी, ड्रामा और अपने सपनों को सच कर दिखने वाले लोगों की कहानी को देखने में इंटरेस्टेड है,तब इस फिल्म को रिकमेंड कर सकते हैं। जिसमें आपको ठीक उसी तरह का जुड़ाव महसूस होगा जैसा, साल 2009 में आई फरहान अख्तर की फिल्म “लक बाय चांस” में देखने को मिला था।

फिल्मीड्रिप रेटिंग:5/3  ⭐ ⭐ ⭐.

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