Inspector Zende:हल्की कॉमेडी में छिपा असल क्राइम का रोमांच

Written by: Amir khan
Publish On: October 2, 2025 10:26 PM (IST)
Inspector Zende Review hindi

जहाँ इस शुक्रवार बागी 4, द कंजूरिंग, द बंगाल फाइल्स जैसी फ़िल्में सिनेमाघरों में लगी हुई हैं, वहीं नेटफ्लिक्स पर मनोज बाजपेयी की फ़िल्म इंस्पेक्टर ज़ेंडे रिलीज़ हुई है। मनोज बाजपेयी अभिनीत सिर्फ़ एक बांदा काफ़ी है देखने के बाद एक बात तो पता चल गई थी कि इनकी फ़िल्मों में कंटेंट की कमी होने के बावजूद ये अपनी एक्टिंग के बल पर उसे यूनिक बनाने में माहिर हैं। इंस्पेक्टर ज़ेंडे को लाइट-हर्टेड कॉमेडी फ़िल्म कहा जा सकता है।

इसकी कहानी आधारित है असल ज़िंदगी में हुए एक किस्से पर। कहानी कालभोजराज (चार्ल्स शोभराज)के किस्से सुनाती है। कालभोजराज एक समय में इतना बड़ा क्रिमिनल था, जिसे भारत सहित और भी कई देशों की पुलिस तलाश रही थी। जिस तकनीक से यह लोगों को मारता-लूटता था, वह सुनकर कोई भी दंग रह जाएगा। इनकी ज़िंदगी के एक छोटे से हिस्से को इंट्रेस्टिंग तरीके से रखकर इंस्पेक्टर ज़ेंडे में पेश किया गया है।

कहानी

यह कहानी है चार्ल्स शोभराज के जीवन की। वह समय था 1970 का, जब इसकी ख़बरें मीडिया में आने लगी थीं। चार्ल्स को “बिकिनी किलर” और “द सर्पेंट” के नाम से भी पुकारा जाता था। लोमड़ी सा चालाक दिमाग रखने वाला चार्ल्स ने 20 से ज़्यादा लोगों की जान ली, जिनमें 14 थाईलैंड के पर्यटक भी शामिल थे। यह अपने आकर्षक लुक से लोगों को फँसाता था, फिर ज़हर देकर उन्हें लूटकर मार देता था। उस समय मुंबई में एक इंस्पेक्टर मधुकर ज़ेंडे हुआ करते थे।

इन्होंने चार्ल्स को एक नहीं, बल्कि दो बार पकड़ा था। एक ऐसा खतरनाक किलर और लुटेरा, जिसने कई देशों की पुलिस को चकमा दिया था, उसे पकड़ा था मुंबई में रहने वाले एक इंस्पेक्टर ने। इस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं मनोज बाजपेयी। 1976 में चार्ल्स को पकड़ा जाता है और यह तिहाड़ जेल में 1976 से 1997 तक सजा काटने के बाद 1986 में तिहाड़ जेल से भाग जाता है।

तब इसे पकड़ने की ज़िम्मेदारी एक बार फिर से मनोज बाजपेयी को दी जाती है। यहाँ पुलिस इन्वेस्टिगेशन, कॉमेडी, ड्रामा सब कुछ एक साथ एक जगह पर देखने को मिलेगा। 1 घंटा 52 मिनट की इस फ़िल्म को बहुत अच्छे से पेश किया गया है, जो आसानी से समझ आती है। कहानी मुंबई की है, तो इस फ़िल्म के अंदर बहुत से मराठी एक्टर को लिया गया है ताकि इसे रियलिटी के करीब रखा जा सके। यही वजह है कि फ़िल्म के बहुत से सीन में मराठी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। पाँच बार जेल से फरार चार्ल्स आख़िर लोगों को क्यों मारता है साँप से ज़्यादा तेज़ यह सीरियल किलर को अब इंस्पेक्टर ज़ेंडे, जिन्होंने 15 साल पहले इसे पकड़ा था, अब वह किस तरह से दोबारा इसे पकड़ता है, यही इसकी आगे की कहानी है।

इंस्पेक्टर ज़ेंडे के अच्छे और बुरे पहलू

जिस तरह से चीज़ों को यहाँ सॉफ्ट कॉमेडी पंच के साथ पेश किया गया है, वो देखने में मज़ेदार है। कभी-कभी फ़िल्म की कहानी थोड़ी बचकानी लगती है, तो अगले ही पल सीरियस भी हो जाती है। सिचुएशनल कॉमेडी सीन को फ़िल्म में इस तरह से डाला गया है कि जिन्हें देख हँसी रोकना मुश्किल हो जाता है। मनोज बाजपेयी अपनी एक्टिंग से बोर तो बिल्कुल भी नहीं करते। जिस तरह से शुरुआत में इंस्पेक्टर सीरियल किलर को पकड़ने में लगे हुए होते हैं, अंत तक वह बहुत हल्का-फुल्का सा महसूस होता है।

अगर यहाँ थ्रिल और चीज़ों को कॉम्प्लिकेटेड करके दिखाया जाता, तो शायद क्लाइमेक्स और बेहतर हो सकता था। पर फिर भी क्लाइमेक्स सिम्पल होते हुए भी एंगेजिंग है। राइटर ने कहानी को बहुत अच्छे से लिखा है। विलेन के ब्रूटल सीन ठीक-ठाक से लगते हैं। दर्शकों को पता होता है कि स्टोरी आगे क्या होने वाली है, पर फिर भी अंत देखने में मज़ा आता है, जिसकी एक वजह स्क्रीनप्ले और डायलॉग भी हैं।

मनोज बाजपेयी ने अपने फेस एक्सप्रेशन्स से जिस तरह से कॉमेडी को पेश किया है, वो देखने में मज़ेदार है। कार्ल भोजराज के रोल में जिम सर्भ एकदम परफेक्ट कास्टिंग हैं। आर्ट डायरेक्टर ने 80 के दशक को बहुत अच्छे से पेश किया है, जिसे देख लगता है कि डिटेलिंग पर बहुत मेहनत की गई है।बॉलीवुड में पहले भी चार्ल्स के जीवन के ऊपर रणदीप हुड्डा की 2015 में मैं और चार्ल्स नाम की फ़िल्म रिलीज़ हो चुकी है।

निष्कर्ष

इस फ़िल्म को ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि यह मास्टरपीस है, पर फिर भी यह दर्शकों का मनोरंजन करने में पूरी तरह से कामयाब रहती है, क्योंकि इसका प्रेजेंटेशन, कॉमिक टाइमिंग, कैरेक्टर परफॉर्मेंस, फ़ास्ट स्टोरी कहानी से बाँधे रखने में पूरी तरह से कामयाब रहता है। इस वीकेंड अगर सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई फ़िल्में देखने का मन नहीं है, तो इंस्पेक्टर ज़ेंडे हल्की-फुल्की कॉमेडी के मज़े के साथ देखी जा सकती है।

भारत में न जाने कितने ऐसे इंस्पेक्टर हुए, जिनके बहादुरी के किस्से हमें नहीं पता, पर इस फ़िल्म के माध्यम से इंस्पेक्टर ज़ेंडे की कहानी के बारे में पता चला, जिसके लिए डायरेक्टर चिन्मय मंडलेकर का शुक्रिया कहना तो बनता है और साथ ही प्रोड्यूसर ओम राउत का, जिन्होंने एक अच्छे कॉन्सेप्ट को प्रोड्यूस किया। मेरी तरफ़ से इसे दिए जाते हैं 5 स्टार में से 3 स्टार की रेटिंग।

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